आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता हमारा भारत

‘अमृतकाल में विकसित भारत की आधारशिला केवल और केवल स्वदेशी व आत्मनिर्भरता के माध्यम से ही तय हो सकती है। देश की सुरक्षा की तैयारियों से लेकर सेमीकंडक्टर चिप बनाने तक और खेती के लिए जरूरी उर्वरक बनाने से लेकर 10 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था बनाने तक का लक्ष्य केवल और केवल देश की आत्मनिर्भरता से ही संभव होगा।

इसके लिए नवाचार, स्वदेशी तकनीक के विकास और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास शुरू हो चुके हैं। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देशवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तकनीकी विकास में नवाचार, निर्माण और उपयोग में स्वदेशी की भावना और हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का मंत्र देकर यह तय कर दिया है कि इक्कीसवीं सदी के अगले 50 साल भारत के विकास के हैं और उससे कोई समझौता नहीं किया जाएगा। 

वास्तव में स्वदेशी के भाव के साथ आत्मनिर्भरता प्राप्त करना ही सामाजिक विकास का सबसे अधिक मौलिक मंत्र है। किसी भी राष्ट्र और समाज के निरंतर गतिशील बने रहने की पहली शर्त होती है कि वह आत्मनिर्भर हो और नवप्रवर्तन के माध्यम से समकालीन चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करता रहे। यही वजह रही कि भारत सरकार द्वारा 13 मई, 2020 को देश को हर मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनाने के लिए अभियान शुरू किया गया। यह वह समय था, जब भारत सहित पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही थी। हमारे ही देश के लाखों-करोड़ों लोगों के समक्ष जीवनयापन का संकट पैदा हो गया था।

पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही थी। ऐसे में बहुत जरूरी था कि अपने लोगों की हिम्मत और देश व समाज की गतिशीलता बनाए रखी जाए। इसी बात को ध्यान में रखकर यह अभियान सामने आया। भारत सरकार ने तब इस अभियान को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी। आज इस दिशा में निरंतर नये-नये कदम उठाए जा रहे हैं। तय है कि इस अभियान का मूल उद्देश्य देश को हर मायने में स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाना है।

भारत सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के 5 स्तंभ निर्धारित किए गए हैं, जिनमें अर्थव्यवस्था, अवसंरचना यानी बुनियादी ढांचा, तर्कसंगत प्रणाली, जीवंत जनसांख्यिकी और मांग व उसकी आपूर्ति को शामिल किया गया है। इसे, इस तरह भी समझा जा सकता है कि यहां ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जो मात्रा में उछाल, वृद्धिशील परिवर्तन नहीं होने देने में मदद करे, अवसंरचना वह, जो आधुनिक भारत का प्रतिनिधित्व करती हो, प्रणाली यानी कि प्रौद्योगिकी सक्षम प्रणाली, जीवंत जनसांख्यिकी से मतलब यह कि सबसे बड़ा लोकतंत्र और इसकी जीवंत जनसांख्यिकी तथा मांग व आपूर्ति का अर्थ है कि मांग और आपूर्ति को ध्यान में रखकर उत्पादन की शक्ति का पूर्ण उपयोग करना।

इससे जिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में योजना का लाभ होगा, उनमें कृषि और आपूर्ति श्रृंखला और प्रणाली, तर्कसंगत कर प्रणाली, इन्फ्रास्ट्रक्चर का सुधार, सक्षम मानव संसाधन, स्टार्टअप्स और स्माल-स्केल यूनिट्स को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक स्थिति, अच्छ निवेश के अवसर और मेक इन इंडिया मिशन शामिल हैं।

आत्मनिर्भर भारत की कल्पना को साकार करने के अभियान में जिन मुख्य लक्ष्यों को शामिल किया गया है उनमें भारत की आधारभूत संरचना की प्रगति और उसके मील के पत्थर बनने का उत्सव मनाना और यह सुनिश्चित करना कि यह कैसे विकास और आत्मानिर्भरता को बढ़ावा दे सकता है, मुख्य रूप से शामिल है। आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल अभिगम्यता यानी डिजिटल दुनिया तक लोगों की पहुंच को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया और देश में लगातार बढ़ रही डिजिटल अभिगम्यता इस बात को प्रमाणित भी करती है कि डिजिटल एक्सेस कैसे आत्मनिर्भरता को सक्षम बना रहा है।

इसी क्रम में युवाओं में उद्यमेशीलता की मानसिकता को विकसित करने के लिए कार्यक्रम, समूह आधारित शिक्षा और परामर्श के अवसर, प्रतियोगिताएं, सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और इनसे जुड़ी हुई सार्थक गतिविधियों आदि को महत्व दिया जा रहा है। वैश्विक विकास और प्रगति में योगदान देने वाले भारत के अभिनव स्टार्टअप को सामने लाने और उन्हें लाखों युवाओं का प्रेरणा के स्रोत बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यही वजह है कि सक्षम मानव संसाधन के विकास को लेकर नित नई-नई पहल की जा रही हैं। नई शिक्षा नीति में कौशल विकास और मानव संसाधन का प्रशिक्षण को इस तरह शामिल किया गया है कि युवाओं को रोजगर के नये-नये विकल्प मिल सकें।

भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चौतरफा तैयारी दिख रही है और जिनपर बहुत तेजी से अमल किया जाना भी शुरू हो चुका है। इसे समझने के लिए ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ओडीओपी) की योजना का उदाहरण लिया जा सकता है। योजना के शुरूआती दिनों में ही इस पहल ने देश भर के 761 जिलों से कुल 1102 उत्पादों की पहचान करके उन्हें आगे बढ़ाने का काम शुरू कर दिया है। इस पहल के माध्यम से भारत में आत्मनिर्भर भारत अभियान के कुटीर उद्योग, गृह उद्योग, लघु उद्योग, एमएस एमई, मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग के लोगों को लाभ और राहतें उपलब्ध करायी गई हैं।  यही नहीं इस पहल में स्थानीय कारीगरों, बुनकरों, निमार्ताओं आदि के लिए क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए जैविक प्रमाणीकरण, डिजाइन विकास आदि पर क्षमता निर्माण कार्यशालाएं आयोजित कर रही है। इसी तरह की दूसरी योजना है ‘मेक इन इंडिया’। भारत सरकार ने वर्ष 2014 में ही निवेश को बढ़ावा देने, नवाचार को बढ़ावा देने, कौशल विकास को बढ़ाने, बौद्धिक संपदा की रक्षा करने और सर्वोत्तम श्रेणी के विनिर्माण बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए ‘मेक इन इंडिया’ अभियान शुरू किया था।  यह कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत, भारत में कारोबार करने की आसानी पर केंद्रित अनेक उपाय किए गए। एकदम नए, आईटी-प्रेरित अनुप्रयोग और ट्रैकिंग प्रक्रियाएं अब फाइलों और लालफीताशाही की जगह ले रही हैं। नीति नियंताओं का मानना है कि आज भारत की विश्वसनीयता जितनी ठोस है, उतनी कभी नहीं थी। इसमें गति, ऊर्जा और आशावाद है, जो साफ दिखाई दे रही है। ‘मेक इन इंडिया’ निवेश और निर्यात की नई-नई खिड़कियां खोल रहा है।

आज जिन क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता दिखनी शुरू हो गई है, उनमें कृषि, रक्षा, ऊर्जा और परिवहन के क्षेत्र सबसे आगे हैं। यह क्या कम नहीं है कि आजादी के 79 वर्षों बाद हमारी आजादी के पर्व पर हमारे राष्ट्र ध्वज को देश में ही निर्मित तोपें ने सालामी दे रही हैं, हमारे अंतरिक्ष यान को लेकर देश में ही निर्मित रॉकेट लेकर उड़ान भर रहा है। जैव ईधन के मामले में हम लगातार आगे बढ़ रहे हैं। अब हमारी अपनी मिसाइलें हैं तो आर्टफीशियल इंटेलिजेंस की तकनीक के हमारे अपने नवाचारी प्रयोग। हम सेमीकंडक्टर चिप निर्माण करने लगे हैं तो हाइड्रोजन ईंधन का उपयोग बढ़ाने की दिशा में हम काम कर रहे हैं।

ऐसे अनिगन उदाहरण हैं जो यह तय करते हैं कि हम सधे कदमों से आत्मनिर्भरता के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। यह इसलिए की हम ही हैं, जो समग्रता और समावेशी नीतियों पर चलते हुए ‘सबका साथ-सबका विकास- सबका विश्वास’ और ‘जय जवान-जय किसान, जय विज्ञान-जय अनुसंधान’ जैसे नारे देने और उन पर समय रहते अमल करने की ताकत रखते हैं।

आत्मनिर्भर भारत की बात करने के साथ-साथ यह जानना जरूरी है कि हमारा समय विज्ञान व तकनीकी संचार में ऊफान का समय है। एक ऐसा समय, जो रोज-ब-रोज आर्ट फिशियल इंटेलिजेंस में नित नए करतब और कमाल दिखा रहा है। एक ऐसा समय जो हमें चिप-कम्युनिकेशन की दुनिया में कुलांचे भरने को तैयार कर रहा है। एक ऐसा समय भी, जो रोबोटिक्स और आॅग्मेंटेड रियलिटी के नये-नये उपयोगों की फेहरिस्त लंबी करता जा कहा है। यह, यूं ही नहीं है कि हमारा देश सेमीकंडक्टर चिप निर्माण की दिशा में पहल कर चुका है। नतीजा यह है कि इस बदलते दौर में दुनिया के बहुतेरे देश इस समय में सामाजिक-आर्थिक विकास के अधिक से अधिक लाभ पाने लिए नये-नये अवसर तलाशने की होड़ में शामिल हो चुके हैं।

हम कह सकते हैं कि इक्कीसवीं सदी का यह तीसरा दशक शोध और नवाचार की जुगलबंदी के साथ सामाजिक व आर्थिक विकास के नये फार्मूले तलाशने का दशक है। और, जब हम समग्र व समावेशी सामाजिक-आर्थिक विकास को लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ रहे हों तो हमारे लिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि इसके लिए हमें शोधकतार्ओं, नवाचारियों और प्रतिभागी नागरिकों के बीच की मजबूत पारस्परिक नातेदारी की जरूरत पड़ेगी। जाहिर है कि भारत की आत्मनिर्भरता के लिए हमें अपने यहां शोध, नवाचार और विज्ञान संचार की गुंजाइश को बढ़ाना होगा। पिछले दिनों भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन की स्थापना, इसी क्रम में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। 

वास्तव में भारत सरकार ने जिस राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन की स्थापना की है, उसका काम देश में उपयोगी शोध और अनुसंधान को बढ़ावा देना, नये क्षेत्रों में शोध को प्रेरित करना, उपयोगी शोधकार्यों को उद्योग से जोड़ा, शोध व अनुसंधान की गुणवत्ता बनाए रखना और देश में शोध के लिए फंड की कमी न होने देना निर्धारित किया गया है। यह शोध फाउंडेशन देश में वैज्ञानिक अनुसंधान की उच्च स्तरीय रणनीतिक दिशा प्रदान करने की दिशा में शीर्ष निकाय की तरह काम करेगा।

हमें, यह जल्दी से जल्दी समझ लेना होगा कि हम तब तक आत्मनिर्भर होने के अंतिम लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकते, जब तक कि हम लोगों की तीन भूख शांत नहीं कर देते। दिमाग की भूख यानी अशिक्षा, पेट की भूख यानी भुखमरी और बचत की भूख यानी बेरोजगारी को समाप्त करना सबसे बड़ी चुनौती है। और, इसके लिए जरूरी है कि हम लगातार विज्ञान व तकनीकी संचार के माध्यम से अपने लोगों को समय के साथ चलने के लिए तैयार करते रहें।

हमें गर्व होना चाहिए कि आजादी के 79 वर्ष पूरे कर चुका अपना देश भारत अब अपने 100वें वर्ष की ओर बढ़ चुका है। भारत सरकार ने इस अवधि को अमृतकाल कहा है। टेक्नोलॉजी के बलबूते बदलती दुनिया और बदलते समय में यदि हमें वास्तविक अमृतकाल में अपने देश को ले जाना है तो हर हाल में आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा। आत्मनिर्भरता की परिभाषा में स्वतंत्रता, स्वराज, स्वजन, स्वावलंबन, स्वाभिमान, स्वनिर्भरता जैसे शब्दों का समावेश होना जरूरी होता है। भारत के परिपेक्ष्य में यह भी जरूरी है कि जब आत्मनिर्भरता की परिभाषा को अमल में लाया जाए तो उसमें हमारी संस्कृति, संस्कार, सरोकार को मुकम्मल जगह मिली हो। भारत सरकार ने आत्मनिर्भर भारत का जो स्वप्न देखा है, उसमें स्वजनों की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनके स्वाभिमान और स्वावलंबन को जगह देते हुए स्वतंत्र स्वराज को और अधिक मजबूती प्रदान करने का लक्ष्य निहित है।

‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने की तरफ पुख्ता कदम बढ़ाने के लिए जन-भागीदारी सुनिश्चित करने का शपथ पत्र भी है, जिस पर अमल करने की शपथ अब तक लाखों भारतीय ले चुके हैं। इस शपथपत्र में जो कुछ कहा गया है, उसे दोहरा लेना हर भारतीय के लिए जरूरी है। इसमें कहा गया है कि- ‘मैं खुद को भारतीयों की मेहनत से बने और भारत में बने उत्पादों को खरीदने और इस्तेमाल करने लिए प्रतिबद्ध करता/करती हूं। मैं भारतीय इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के इस्तेमाल की शपथ लेता/लेती हूं। मैं भारतीय सेल्फ केयर वस्तुओं के इस्तेमाल की शपथ लेता/लेती हूं। मैं भारतीय कपड़ों के इस्तेमाल की शपथ लेता/लेती हूं। मैं भारतीय कार्यालय एवं आॅफिस के उपयोग की वस्तुओं के इस्तेमाल की शपथ लेता/लेती हूं। मैं भारतीय रसोई की वस्तुओं के इस्तेमाल की शपथ लेता/लेती हूं। मैं अन्य भारत में बनी वस्तुओं के इस्तेमाल की शपथ लेता/लेती हूं। मैं अपने परिवार और दोस्तों को भारतीय उत्पादों को खरीदने और इस्तेमाल के लिए प्रेरित करूंगा/करुंगी’।

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