‘संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो भला हो जिसमें देश का वो काम सब किए चलो’ इस ध्येय को लेकर चलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अपनी इस गौरव पूर्ण यात्रा में संघ ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। संघ को पीछे धकेलने के कई बार प्रयत्न हुए। मनमाने आरोप लगाकर संघ पर कई बार प्रतिबंध लगाए गए लेकिन अपनी प्रतिबद्धता एवं अनोखी कार्यशैली से संघ ने सभी बाधाओं को पार कर लिया। विघ्न बाधाओं की दहकती ज्वाला में संघ कुंदन की तरह निखर कर पहले से भी सशक्त रूप में उभर कर समाज के सामने आया। नेतृत्व पर अटल विश्वास बनाए हुए स्वयंसेवकों ने आपातकाल के दमनचक्र को पूरी बहादुरी के साथ झेला।
इसके फलस्वरूप लोकतंत्र को विफल कर अधिनायक वादी प्रवृत्ति को पोषित करने वालों के सपने चकनाचूर हो गए। संघ के वास्तविक स्वरूप के बारे मे संघ विरोधी शक्तियों ने समाज में तमाम तरह की भ्रांतियां फैलाईं। संघ को फासिस्ट व सांप्रदायिक कहा गया। संघ इन सबकी परवाह किए बिना अपने मार्ग पर चलता रहा और उसके वास्तविक स्वरूप की जानकारी काफी हद तक अब समाज को हो गई है। शताब्दी वर्ष में देशवासियों को संघ के बारे में और भी जानने समझने का अवसर मिलेगा। संघ को समझने का यह एक स्वर्णिम अवसर है।
संघ विरोधी भी अब संघ के प्रशंसक
संघ के समानांतर स्थापित हुए कई संगठन या तो कालकवलित हो गए या टुकड़े-टुकड़े होकर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई दे रहे हैं। संघ की यह 100 वर्ष की यात्रा समाज वैज्ञानिकों के चिंतन का विषय बनी हुई है। संघ की संगठन शक्ति और उसकी कार्यशैली पर देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अनुसंधान चल रहे हैं।
स्वयंसेवकों की नि:स्वार्थ देश सेवा एवं समाज बंधुओ की संकट के समय सहायता हेतु अग्रणी भूमिका में दिखाई देने के कारण वैचारिक रूप से संघ का विरोध करने वालों को भी अपनी सोच बदलने के लिए विवश होना पड़ रहा है। हाल ही में कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री एवं वहां के एक विधायक ने भरे सदन मे संघ की प्रार्थना सुना कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। साथ ही यह भी कहा कि संघ की प्रार्थना में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। इस तरह के कथन संघ के प्रति बदलते हुए दृष्टिकोण के परिचायक हैं। मूलत: संघ का कार्य समाज में वैचारिक जागृति लाना, देश भक्ति का भाव जगाना और व्यक्ति निर्माण है।
अपने इसी उद्देश्य को लेकर संघ 1925 से लगातार कार्य करता चला आ रहा है। संघ का शक्ति केन्द्र उसकी शाखाएं हैं। देव दुर्लभ कार्यकतार्ओं का निर्माण इन्हीं शाखाओ पर होता है। 100 वर्षों की इस लंबी यात्रा में संघ के कार्य क्षेत्र में कुछ और भी नए-नए विषय जुड़े हैं। व्यक्ति निर्माण के साथ ही साथ संघ ने सेवा के क्षेत्र में विशेष कार्य प्रारंभ किए हैं। इस समय पूरे देश में एक लाख से अधिक सेवा कार्य संचालित किये जा रहे हैं। संघ को अपने कार्य विस्तार के लिए जबरदस्त प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा है। संघ की यह यात्रा हजारों बलिदानों से सजी है। जब भी भारत माता ने पुकारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति देने में संकोच नहीं किया। केरल से लेकर कश्मीर पश्चिम बंगाल तथा पूर्वोत्तर भारत में अनेकों स्वयंसेवकों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन मात्र नहीं बल्कि यह एक जीवन दर्शन है, जहां राष्ट्र सर्वोपरि और सेवा साधना है।देश विभाजन के समय दंगों में हिंदू समाज की रक्षा करते हुए अनेक स्वयंसेवकों को भी अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा है।देश में जब भी जहां भी प्राकृतिक आपदाएं आई हैं आवश्यकता के अनुसार संघ के स्वयंसेवक वहां निस्वार्थ भाव से पहुंचकर सेवा कार्य में अपने को समर्पित किए हैं। 100 वर्षों की इस यात्रा में गो रक्षा, संस्कृति संरक्षण और सामाजिक समरसता के लिए संघर्ष करते हुए हजारों स्वयंसेवकों ने अपने जीवन का बलिदान किया है। इन बलिदानी स्वयंसेवकों का नाम इतिहास की किताबों में भले ना हो लेकिन इनका त्याग हर राष्ट्रभक्त के हृदय में अमर है। संघशताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के बारे में पिछले तीन वर्षों से लगातार मंथन चल रहा था। इन तीन वर्षों मे 200 से अधिक सुझाव आए। सभी सुझावों पर गहराई से विचार विमर्श करने के बाद सात प्रमुख कार्यक्रम निर्धारित किए गए। ये कार्यक्रम अक्टूबर 2025 की विजयदशमी से प्रारंभ होकर पूरे वर्ष तक चलते रहेंगे।
कार्यक्रमों का उद्देश्य
सर्वस्पर्शी व सर्वव्यापी कार्य के स्वरूप का दिग्दर्शन कराना, कार्य की गुणात्मकता मे वृद्धि सुप्तशक्ति एवं सज्जन शक्ति का जागरण, शाखा समाज परिवर्तन का केंद्र बने तथा समाज मे वैचारिक विमर्श खड़ा हो। इन कार्यक्रमों को छोड़कर अन्य कार्यक्रम भी स्थानीय स्तर पर संगठन के पदाधिकारियों की सहमति से संचालित किये जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ शाखाओं ने शताब्दी वर्ष में 100स्वयं सेवकों की शाखा चलाने का निश्चय किया है। कुल मिला कर शताब्दी वर्ष मे सभी प्रकार के स्वयंसेवको को सक्रिय करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है इसमें नित्य शक्ति सुप्त शक्ति दोनों ही प्रकार के स्वयंसेवक अपना पूर्ण योगदान संघ के कार्यक्रमों में प्रदान करेंगे। जो स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखाओ में आते हैं वे नित्य शक्ति के अंतर्गत है तथा जिनकी दैनिक सक्रियता नहीं रहती ऐसे स्वयंसेवक सुप्त शक्ति के अंतर्गत परिगणित किए गए हैं।
प्रतिनिधि सभा का संकल्प

शताब्दी वर्ष को लेकर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में पारित संकल्प इसके मूल उद्देश्यों पर गहराई से प्रकाश डालता है। यह संकल्प सभी स्वयंसेवकों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में काम करेगा। संकल्प में कहा गया है कि अनंत काल से ही हिंदू समाज एक प्रदीर्घ और अविस्मरणीय यात्रा में साधना रत रहा है जिसका उद्देश्य मानव एकता और विश्व कल्याण है। तेजस्वी मातृशक्ति सहित संतों, धमार्चार्योे तथा महापुरुषों के आशीर्वाद एवं कृतित्व के कारण हमारा राष्ट्र कई प्रकार के उतार चढ़ाव के उपरांत भी निरंतर आगे बढ़ रहा है। काल के प्रवाह में राष्ट्र जीवन मे आए अनेक दोषों को दूर कर एक संगठित चरित्र संपन्न और सामर्थ्यवान राष्ट्र के रूप में भारत को परम वैभव तक ले जाने हेतु परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने सन 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य प्रारंभ किया।
संघ कार्य का बीजारोपण करते हुए डॉ. हेडगेवार ने दैनिक शाखा के रूप में व्यक्ति निर्माण की एक अनूठी कार्य पद्धति विकसित की जो हमारी सनातन परंपराओं व मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र निर्माण का नि:स्वार्थ तप बन गया। उनके जीवनकाल में ही इस कार्य का एक राष्ट्रव्यापी स्वरूप विकसित हो गया। द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय श्री गुरु जी के दूरदर्शी नेतृत्व में राष्ट्रीय जीवन के विविध क्षेत्रों में शाश्वत चिंतन के प्रकाश में कॉल सुसंगत युगानुकूल रचनाओं के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
100 वर्ष की इस यात्रा में संघ ने दैनिक शाखा द्वारा अर्जित संस्कारों से समाज का अटूट विश्वास और स्नेह प्राप्त किया। इस कालखंड में संघ के स्वयंसेवकों ने प्रेम और आत्मीयता के बल पर मान अपमान और राग द्वेष से ऊपर उठकर सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया। शताब्दी वर्ष के अवसर पर हम सब का कर्तव्य है कि पूज्य संतो और समाज की सज्जन शक्ति,जिनका आशीर्वाद और सहयोग हर परिस्थिति में हमारा संबल बना, जीवन समर्पित करने वाले निस्वार्थ कार्यकर्ता व मौन साधना में रत स्वयंसेवक परिवारों का स्मरण करें। अपनी प्राचीन संस्कृति व समृद्ध परंपराओं के चलते सौहार्द्रपूर्ण विश्व का निर्माण करने के लिए भारत के पास अनुभव जनित ज्ञान उपलब्ध है। हमारा चिंतन विभेदकारी और आत्मघाती प्रवृत्तियों से मनुष्य को सुरक्षित रखते हुए चराचर जगत में एक तत्व की भावना तथा शांति सुनिश्चित करना है। संघ का यह मानना है कि धर्म के अधिष्ठान पर आत्मविश्वास से परिपूर्ण संगठित सामूहिक जीवन के आधार पर ही हिंदू समाज अपने वैश्विक दायित्व का निर्वाह प्रभावी रूप से कर सकेगा। हमारा कर्तव्य है कि सभी प्रकार के भेद को नकारने वाला समरसता युक्त आचरण, पर्यावरण मूलक जीवन शैली पर आधारित मूल्याधिष्ठित परिवार, स्वबोध से ओतप्रोत व नागरिक कर्तव्यों के लिए प्रतिबद्ध समाज का चित्र खड़ा करने के लिए हम सब संकल्प करें। हम इसके आधार पर समाज के सब प्रश्नों का समाधान, चुनौतियो का उत्तर देते हुए भौतिक समृद्धि एवं आध्यात्मिकता से परिपूर्ण समर्थ राष्ट्र जीवन खड़ा कर सकेगे।
पंच परिवर्तन का लक्ष्य
संघ ने शताब्दी वर्ष में मुख्यत: 5 विषयों को लेकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक जाने का लक्ष्य तय किया है, इन्हें ही पंच परिवर्तन कहा गया है। स्वयंसेवक इन विषयों पर प्रबोधन व प्रचार तक सीमित नहीं रहेंगे। पहले स्वयं के फिर परिवार के आचरण व्यवहार मे इस विषय को लाकर इन्हें अपना स्वभाव बनाएंगे। समाज का प्रत्येक व्यक्ति पांच परिवर्तन को जाने माने व अपने जीवन में अपनाये इस उद्देश्य को लेकर जन जागरण का कार्य करने की योजना बनाई गई है। सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी जीवन शैली और नागरिक अनुशासन को ही पंच परिवर्तन कहा गया है।
