अंधविश्वास और राष्ट्रनिर्माण का संगम
भारत की धरती रहस्यों से भरी हुई है। कहीं प्राचीन किलों और हवेलियों में लोककथाएं जीवित हैं, तो कहीं पुराने खंडहरों में डरावनी कहानियां लोगों को अपनी ओर खींचती हैं। महाराष्ट्र के पुणे शहर का मोहिते का बाड़ा भी ऐसा ही एक स्थान है, जो वर्षों से ‘भूतों का अड्डा’ कहकर बदनाम किया जाता रहा। लोग मानते थे कि यहां रात के अंधेरे में अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देती हैं और यहां कोई साधारण व्यक्ति देर तक नहीं ठहर सकता। लेकिन, इतिहास की विडंबना देखिए कि जिस स्थान को लोग भूतों का घर मानकर दूर रहते थे, वही स्थान बाद में राष्ट्रवाद और संगठन निर्माण का केंद्र बन गया। यह कहानी है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा की, जो इस अंधविश्वासी वातावरण के बीच शुरू हुई जिसने वहां की परंपराओं और विश्वासों को ही बदल डाला।
मोहिते का बाड़ा-रहस्य और डर का केंद्र

पुणे शहर का यह इलाका ऐतिहासिक दृष्टि से काफी पुराना है। मोहिते परिवार कभी मराठा साम्राज्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। उनके वंशजों ने इस विशाल बाड़े (आवासीय परिसर) का निर्माण किया था। यह परिसर इतना बड़ा था कि इसमें दर्जनों परिवार रह सकते थे।
गुजरते समय के साथ यह बाड़ा सुनसान हो गया। पुरानी दीवारों में दरारें, टूटे हुए खिड़की-दरवाजे और अंधेरे गलियारे, यहां भय का वातावरण पैदा करते थे। स्थानीय लोगों का मानना था कि रात को यहां से अजीब आवाजें आती हैं। कभी बच्चों के रोने की तो कभी किसी के पैरों की आहट की। धीरे-धीरे इस स्थान की पहचान ‘भूतिया बाड़ा’ के रूप में होने लगी। कहा जाता था कि पेशवा काल में इस बाड़े में कई गुप्त कक्ष थे, जिनमें सेनापति लोग बैठकें करते थे।एक कथा के अनुसार, एक युद्ध में मारे गए सैनिकों की आत्माएं यहां भटकती हैं। कई बार लोगों ने दावा किया कि उन्होंने यहां सफेद कपड़े पहने अजीब आकृतियां देखी हैं। इन कहानियों के कारण लोग यहां से गुजरने से भी डरते थे। शाम होते ही यह पूरा इलाका वीरान हो जाता था।
संघ की स्थापना और नये प्रयोग की जरूरत
1925 में जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तब उनका मुख्य उद्देश्य था-राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और संगठन की भावना का विकास करना। शाखाओं के माध्यम से युवाओं को संगठित करने का कार्य तेजी से चल रहा था, लेकिन एक चुनौती थी -शाखा के लिए उपयुक्त स्थान का मिलना। पुणे जैसे शहर में खुले मैदान की कमी थी। ऐसे में कई स्वयं सेवकों ने सुझाव दिया कि मोहिते का बाड़ा खाली पड़ा है और वहां शाखा लगाई जा सकती है। इस सुझाव से अधिकांश लोग सहमत नहीं थे। कारण साफ था-वह स्थान ‘भूतिया’ कहलाता था।
भय को चुनौती: पहली शाखा का आयोजन डॉ. हेडगेवार अंधविश्वास के विरोधी थे। उनका मानना था कि ‘भूत-प्रेत नहीं होते, यह सब हमारे डर और अज्ञान का परिणाम है।’ उन्होंने स्वयंसेवकों को प्रेरित किया कि यदि हमें समाज से डर और भ्रम को हटाना है, तो शुरूआत खुद से करनी होगी। एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि संघ की शाखा मोहिते के बाड़े में ही लगाई जाएगी। पहली शाखा के दिन कई स्वयंसेवक असमंजस में थे। कोई सोच रहा था कि अगर सच में यहां कुछ हुआ तो? कोई डर के कारण शाखा में देर से पहुंचा, लेकिन हेडगेवारजी का आत्मविश्वास अडिग था।
पहली शाखा का दृश्य
सुबह-सुबह सूरज की किरणें पुराने खंडहरों पर पड़ रही थीं। बाड़े के बीचोबीच झंडा गाड़ा गया। संगीत के ताल पर ‘प्रार्थना’ हुई और शाखा की गतिविधियां शुरू हुईं। शुरूआती दिनों में कुछ स्वयंसेवक डर के कारण इधर-उधर देखते रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका भय कम होने लगा।
हाथीखाना-शक्ति का प्रतीक
संघ की शाखा बढ़ने लगी और अधिक स्थान की आवश्यकता महसूस हुई। इसी दौरान हाथीखाना नामक स्थान का चयन किया गया। हाथीखाना ऐतिहासिक रूप से मराठा काल में हाथियों को रखने का स्थान था। यहां विशाल कमरे और मजबूत दीवारें थीं। लोगों का मानना था कि यह स्थान भी रहस्यमयी है। रात को यहां से हाथियों की चिंघाड़ सुनाई देती है। बावजूद इसके संघ ने इस स्थान को अपने राष्ट्रनिर्माण कार्य के लिए उपयोग करने का निर्णय लिया।
हाथीखाना में नियमित शाखाएं लगने लगीं
युवाओं को दंड, व्यायाम और खेलों के माध्यम से अनुशासन सिखाया जाने लगा। राष्ट्रभक्ति गीत और प्रार्थनाओं से वातावरण गूंजने लगा। धीरे-धीरे लोगों की धारणा बदलने लगी। जो स्थान कभी डर का प्रतीक था, वह अब साहस और संगठन का केंद्र बन गया। मोहिते का बाड़ा और हाथीखाना के आसपास के लोग जो पहले अंधविश्वास में जी रहे थे, अब उनके विचारों में बदलाव आया। भूत-प्रेत का डर खत्म हुआ और लोग अब रात को भी वहां जाने लगे। युवाओं में शाखा के माध्यम से युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत हुई। समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ शाखा में शामिल हुए। संघ ने आसपास के इलाके की सफाई और मरम्मत कराई, जिससे जगह का स्वरूप बदल गया।
अंधविश्वास से विश्वास तक की यात्रा
यह कहानी सिर्फ शाखा की स्थापना की नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण की भी है। जिस स्थान को लोग ‘भूतों का घर’ मानते थे, वह अब राष्ट्र के निर्माण का पवित्र स्थल बन गया।
‘डॉ. हेडगेवार का संदेश’
‘डर केवल मन में होता है। जब मनुष्य भय को त्यागकर संगठन और अनुशासन का मार्ग अपनाता है, तब अंधविश्वास स्वयं नष्ट हो जाता है।’
ऐतिहासिक महत्व और प्रेरणा
आज मोहिते का बाड़ा और हाथीखाना संघ के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं। इन स्थानों की यात्रा हर स्वयंसेवक के लिए प्रेरणादायी होती है। यहां यह देखा जा सकता है कि कैसे एक संगठन ने अंधविश्वास को चुनौती दी कैसे राष्ट्रनिर्माण के कार्य ने समाज की सोच को परिवर्तित किया। समाज में व्याप्त डर, अज्ञान और अंधविश्वास को केवल संगठन और सही नेतृत्व ही दूर कर सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह साबित किया कि राष्ट्रभक्ति और अनुशासन के मार्ग पर चलकर किसी भी स्थान का कायाकल्प किया जा सकता है। आज भी जब शाखा में स्वयंसेवक प्रार्थना करते हैं, तो उनकी आवाज मानो यह संदेश देती है -‘यह भूमि अब भूतों का नहीं, बल्कि भारतमाता के सच्चे सपूतों का घर है।’
