शताब्दी का राष्ट्रीय गौरव: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का शताब्दी वर्ष 2025-2026
भारतीय समाज के इतिहास में ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं, जो केवल एक संगठन की उपलब्धियों का उत्सव न होकर पूरे राष्ट्र की धड़कन बन जाते हैं। 2025 का वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए ऐसा ही एक कालखंड है। विजयदशमी 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित संघ विजयदशमी 2025 (दशहरा) शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। यह उत्सव केवल अतीत को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की दिशा तय करने की भी घड़ी है। संघ अपने 100वें वर्ष को ‘समर्पित सेवा, संवाद और सामाजिक नवजागरण’ का अवसर मानते हुए व्यापक कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है।

राष्ट्रवाद को प्रेरित करता संघ:
अब से ठीक 100 बरस पहले साल 1925 में नागपुर की मिट्टी में बोया गया एक छोटा विचारझ्रबीज आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है, जिसे हम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नाम से जानते हैं।
संस्कार निर्माण का लक्ष्य:
संघ की स्थापना से लेकर आज तक उसका मुख्य उद्देश्य मात्र संगठन खड़ा करना नहीं, बल्कि सजग और जिम्मेदार नागरिक गढ़ना भी रहा है। इस उद्देश्य ने देश को कई अमूल्य प्रतिभाएं भी दीं।
दैनिक शाखाएं और शाखा संस्कृति:
रोजाना सुबह एक घंटे के अभ्यास और संवाद ने लाखों युवाओं को चरित्रवान और अनुशासित जीवन की ओर अग्रसर किया। इससे लोगों की दिनचर्या पर प्रभाव तो पड़ा ही, साथ ही सामाजिक सद्भावना का विकास हुआ।

सामाजिक सहभागिता:
आरंभिक दशकों से ही समाजसेवा, शिक्षा,ग्रामोन्नति व सांस्कृतिक उत्थान संघ की प्राथमिकताओं में शामिल रहा। करोड़ों कार्यकर्ता, हजारों संगठन, समाज के हर कोने में जीवंत शाखाएं, यात्रा की साक्षी हैं।
शताब्दी पर्व की रूपरेखा:
मार्च, 2025 में बेंगलुरु में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधिसभा (एबीपीएस) ने संघ की आगामी रणनीति और शताब्दी वर्ष की दिशा स्पष्ट की। केंद्र में रहा ‘पंच-परिवर्तन’ का संकल्प – पांच स्तंभ जो आने वाले सौ वर्षों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे।
पंच-परिवर्तन के स्तंभ:

सामाजिक समरसता-जातिवाद और विभाजन की दीवारें तोड़कर भाईचारा स्थापित करना।
पारिवारिक जागृति-परिवार में संस्कार, संवाद और जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करना। पर्यावरण चेतना-जीवन और प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए लोगों से आगे आने की अपील करना। स्वत्व-संकल्प (आत्मनिर्भरता)-आत्मभरोसा और नवाचार को प्रोत्साहन देना।
नागरिक कर्तव्य-लोकतांत्रिक चेतना और सामूहिक उत्तरदायित्व की जिम्मेदारी से अवगत कराना। यह चरणबद्ध योजना केवल संगठन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की व्यापक रणनीति के रूप में प्रस्तुत की गई है।
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) 2025: एक ऐतिहासिक पड़ाव
समय: 21-23 मार्च 2025, स्थान: बेंगलुरु। लगभग 1500 प्रतिनिधि, जिनमें संघ प्रमुख मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले उपस्थित रहे। इस ऐतिहासिक सभा में कई सामाजिक मुद्दों पर विस्तार से मंथन किया गया।
मुख्य निर्णय
पंच-परिवर्तन पर विस्तृत ब्लूप्रिंट।
आगामी शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की रूपरेखा तय। अंतरराष्ट्रीय संवाद और विस्तार की रणनीति। सामाजिक समरसता पर बल और विदेशों में कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प। यह आयोजन संघ की 100 वषीर्या योजना की ठोस नींव के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया। नई दिल्ली संगोष्ठी (सितंबर 2025): संघ के 100 बरस पर खास शताब्दी पर्व का सबसे चर्चित चरण बना दिल्ली का यह भव्य आयोजन, जिसने संघ को शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विमर्श के नए आयामों से जोड़ा।
उद्देश्य
समाज के विविध वर्गों-धार्मिक संत, शिक्षाविद्, वैज्ञानिक, कलाकार, खिलाड़ी और स्टार्टअप जगत-से संवाद। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की वैश्विक प्रस्तुति।
युवाओं में राष्ट्र-निर्माण के लिए नई ऊर्जा।
एक महत्त्वपूर्ण संदेश यह रहा कि संघ अब केवल सांस्कृतिक संगठन तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नवाचार और सामाजिक समावेशिता का वाहक है।
विजयदशमी 2025: ‘उत्सव-2025’ का शुभारंभ
दशहरा पर्व यानी 2 अक्टूबर, 2025 से इस उत्सव का शुभारंभ होगा। नागपुर समेत देशव्यापी स्तर पर संघ के शताब्दी पर्व का औपचारिक आगाज होगा। जिसके तहत पूरे देश में विभिन्न कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया जाएगा।
प्रमुख गतिविधियां
विशाल रैलियां और सभाएं-समाज को जागरूक करने हेतु। घर-घर संपर्क अभियान-पुस्तिकाएं और साहित्य वितरण। हिंदू सम्मेलन-बस्तियों और नगरों में सामाजिक एकता का प्रतीक।
युवा सम्मेलन-भविष्य की पीढ़ी में नेतृत्व का विकास।
सामाजिक सद्भाव बैठकें-हर स्तर पर संवाद। विशेष शाखा सत्र-शाखा विस्तार और कार्यकर्ता सशक्तिकरण। विश्लेषकों का मानना है कि संघ इस अवसर को केवल उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य के संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक प्रभाव के पुल के रूप में देख रहा है। केरल और दक्षिण भारत में जनसंपर्क अभियान नवंबर 2025 से जनवरी 2026 तक संघ ने विशेष रूप से दक्षिण भारत पर ध्यान केंद्रित किया है।
उद्देश्य और पहल
गांव-गांव पहुंचकर संवाद करना। हिंदू सम्मेलन-मंडल व ग्राम स्तर पर। सामाजिक सद्भाव बैठकें-जाति और संप्रदाय पर संवाद। युवा संवाद-पर्यावरण, राष्ट्र-निर्माण और सेवा पर चर्चा। संघ के प्रांत प्रचारक ने कहा-‘समरसता केवल विचार नहीं, व्यवहार में उतरे तभी उत्सव सार्थक है।’ यह अभियान दशार्ता है कि संघ ग्रामीण और युवा भारत को शताब्दी पर्व का केंद्र बिंदु बनाना चाहता है।
शताब्दी वर्ष का समापन: विजयदशमी 2026
वर्षभर की गतिविधियों के बाद विजयदशमी 2026 को शताब्दी पर्व का समापन होगा। इसमें पूरे वर्ष की रिपोर्टिंग, अनुभव-साझा और आगामी शताब्दी की दिशा तय की जाएगी।
चरण-दर-चरण यात्रा
मार्च 2025-अइढर: शताब्दी कार्ययोजना का खाका।
अगस्त 2025-दिल्ली संगोष्ठी: बौद्धिक विमर्श।
अक्टूबर 2025-व३२ं५ 2025 की शुरूआत।
नवंबर 2025-जनवरी 2026-दक्षिण भारत में संपर्क अभियान।
अक्टूबर 2026-समीक्षा और समापन।
संघ और सामाजिक पुनर्निर्माण
फरर के शताब्दी पर्व ने एक स्पष्ट संदेश दिया है-‘समाज-निर्माण ही राष्ट्र-निर्माण है।’ सामाजिक समरसता-जातिगत विघटन से परे भाईचारा। पारिवारिक जागृति-संस्कार और जिम्मेदारी।
पर्यावरण चेतना-प्रकृति-संरक्षण।
आत्मनिर्भरता-युवाओं में स्टार्टअप और नवाचार।
नागरिक कर्तव्य-लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी। यह समग्र दृष्टिकोण संघ को केवल एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सामाजिक आंदोलन के रूप में स्थापित करता है।
समालोचनात्मक दृष्टि: संघ का भविष्य-मार्ग
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि संघ का यह शताब्दी पर्व उसके भविष्य के एजेंडे का रोडमैप है। अब संघ सामाजिक-आर्थिक विमर्श, संघ शिक्षा, पर्यावरण और नवाचार में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय विस्तार-विदेशी भाषाओं में साहित्य और विश्व के 18 प्रमुख स्थलों पर कार्यक्रम। युवाओं में पकड़-15-30 आयु वर्ग को लक्ष्य कर भविष्य का नेतृत्व गढ़ना।
उत्सव और परिवर्तन का संगम
संघ का सौवां वर्ष केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य का संकल्प है। संघ प्रमुख मोहन भागवत के शब्दों में-‘हमारा 100वां वर्ष आत्ममंथन और आत्मविस्तार का समय है। संघ कोई सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण है। शताब्दी पर्व आने वाले सौ वर्षों के भारत का रूप गढ़ने का प्रयास है’।
