‘सावन में लग गई आग..’, ‘टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई’ जैसे गानों का अर्थ मैं पहले नहीं समझ पाता था। बहुत परेशान रहता था कि प्यास बुझाने, शीतल करने वाले पानी से भला आग कैसे लग सकती है ! फिर थोड़ा बड़ा हुआ या यूं कहें जवान हुआ, तो ऐसे गानों के मानी समझ में आया, वही जो इस वक्त आप मुस्कुराते हुए समझ रहे हैं। मगर अब कहने में मुझे कोई झिझक नहीं कि मैं अपनी जवानी के दिनों में तब भी गाने के सही माने न समझ सका। हां, इस बार की झमाझम पहली बरसात ने ही ऐसे गानों के असली मानी समझा दिया।
सचमुच बंधू, पानी से आग लगती है। वाकई, पानी आग लगा सकता है। पानी बरसना महज किसी फिल्मी गीत का कोई सिचवेशन नहीं, किसी कवि के कविता लिखने का भाव नहीं, विरह में व्याकुल किसी प्रेमिका के पानी में भीगने का चांस नहीं। इसे पानी नहीं परीक्षक समझिए, परीक्षक। होता तो स्वयं तरल है, मगर परीक्षा लेता है बहुत कड़क। अब देखिए न, यह बरसता पानी कितनों की कैसी-कैसी परीक्षा ले रहा है-
नाली को खुद चोक होने से बचने की, सीवर का रीवर न बनने की, कूड़ा-कर्कट के अपनी जगह पर जमे रहने की, नालों का भावुकता में न उफनाने की, नई सड़कों को अपना फिगर मेंनटेन रखने की, पुरानी सड़कों को अपनी देह पर पडे़ गढ्ढों को तालाब न बनने देने की, लाइट के लगातार रौशन रहने की, पम्पिंगसेट के रुक-रुक के न चलने की, संक्रामक रोगों के फैलने की तीव्र रफ्तार की, ट्रांसफार्मर का खुद को न दगने से बचाने की, लोहे के खम्भों को अपने ऊपर कंरट को दौड़ने से रोकने की, लबलबाते पानी में छुपे खुले मेनहोल की टोह पाने की आदमी के टोहू प्रवृत्ति यानि सिक्स सेंस की, वीआईपी ऐरियों को अपनी ‘प्रेस्टीज’ बचाने की, पिछडे़ इलाकों को इतिहास न दोहराने की, समय पर कार्यालय आने की, देर से घर न पहुंचने की, नौनिहालों के स्वस्थ्य रहने की, बड़ों के बीमार न पड़ने की, मच्छर-मखियों के तैरने की, वाहन के साइलेंसर के न डूबने की । उफ! यह बरसता पानी परीक्षा नहीं अग्निपरीक्षा लेता है। अग्निपरीक्षा!
कल तक जिस शहर को हम सोने की लंका समझ इतराते थे, जरा सी बरसात ने उसे पल भर में कैसे भस्म कर दिया। और हम इस गम के दरिया में न पूरी तरह से डूब रहे न उतरा रहे। शहर पानी-पानी हो रहा और उसके साथ में हम । जिन्होंने कभी विकास की गंगा बहाने की बात करके हम से वोट मांगे थे, वे सरकार आकर खुद देख लें कि नालियों से पानी सरक नहीं रहा और घरों से पानी निकल नहीं रहा! कुछ देर की बरसात, फिर व्यवस्था इसके सामने पानी मांगने पर विवश ।यह बरसात नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, एक आग का दरिया है और व्यवस्था को डूब के जाना है। इसे बरसात का आग मूतना नहीं तो क्या कहेंगे! अफसर-बाबू बनने के लिए कहां एक बार परीक्षा पास करनी पड़ी, मगर यह मुई बरसात हर साल परीक्षा लेती है। इधर बादल बरस रहे, उधर नगर निगम के कंट्रोल रूम में शहरवासी। कह रहे, हुजूर इत्ता तो बताइए इस बरसात के मौसम कैसे हो बसर! और व्यवस्था गरज रही है कि आप बरसात को छोड़ हमारी जान के पीछे क्यों पड़ रहे हैं! अब व्यवस्था को कौन समझाए, अगर वह पहले से जानदार होती, तो इत्ती सी बरसात से इत्तोंं की जान पर न बन आती। अभी तो यह इब्तेदाए बरसात है आगे-आगे देखिए होता है क्या! खुदाया! इस बार भी बरसात हमारे शहर की कड़ी परीक्षा लेगी। या यूं कहे बरसात का पानी सारे शहर में आग लगाएगा। जब बरसात होती है, तब शहर रोता है, उसकी आशाएं बिलखती हैं, उसका रूतबा घटता है, उसका गुरूर टूटता है, शिकायतों-बदइंतजामी के ऊंचे ढेर पर बैठा बेबस शहरी सुलगता है, सूअरों का झुण्ड बेफिक्री से कीचड़ में लोटता, पानी में छई छप छई करता है। वास्तव में, बरसात में सुअरों की मौज होती है और व्यवस्था कुत्ते की मौत मरती है।
अनूप मणि त्रिपाठी
ख्यातिलब्ध व्यंग्यकार
